प्रशांत किशोर
विद्या शंकर राय
बिहार में जैसे जैसे विधानसभा चुनाव करीब आ रहा है वैसे वैसे वहां का राजनीतिक पारा चढ़ता जा रहा है। राजनीतिक दलों की तरफ से सियासी गोटियां बिछनी शुरू हो गई है क्योंकि शतरंज के बिसात पर शह और मात का खेल भी शुरू हो चुका है। अबकी बार बाजी किसके हाथ लगेगी यह तो समय ही बताएगा लेकिन प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति की दिशा बदलने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
प्रशांत किशोर ने जब 2 अक्टूबर, 2022 को पश्चिमी चंपारण के भितिहरवा गांधी आश्रम से पूरे बिहार में अपनी पदयात्रा शुरू की थी उस समय “हमारा नेता कैसा हो, प्रशांत किशोर जैसा हो” जैसे नारे तब गूंज उठे थे। पिछले लगभग 12 वर्षों में, किशोर ने नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल के लिए चुनावी रणनीतियों को आकार देने में मदद की है, लेकिन अब उन्होंने एक महत्वाकांक्षी जमीनी आंदोलन, “जन सुराज” शुरू किया है।
चुनावी रणनीतिकारों की माने तो प्रशांत किशोर राजनेता होने से पहले एक व्यवसायी हैं, और यह देखते हुए कि जन सुराज पार्टी (जेएसपी) उम्मीदवारों के लिए अपेक्षित औसत मतदान 5,000 से 6,000 वोटों का है और चूंकि बिहार में काफी संख्या में सीटें हैं जहां विजेता और उपविजेता के बीच का अंतर इसी सीमा के भीतर आता है, वह अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए इसी का लाभ उठाने का प्रयास करेंगे।
दरअसल जन सुराज पार्टी (JSP) की औपचारिक स्थापना पिछले साल हुई थी, और किशोर ने इस आयोजन के लिए भी 2 अक्टूबर का दिन चुना था। शुरुआत में, उन्होंने दावा किया था कि बिहार की जनता तय करेगी कि यह आंदोलन एक पार्टी में बदलेगा या नहीं।
हालाँकि, यह शुरू से ही स्पष्ट था कि एक राजनीतिक दल का गठन किया जाएगा क्योंकि यात्रा शुरू होने से पहले ही 26 अगस्त, 2022 को भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) में इसी नाम से पंजीकरण के लिए आवेदन दायर किया गया था। ईसीआई के दस्तावेज़ों में एस के मिश्रा को अध्यक्ष, बिजय साहू को महासचिव और अजीत सिंह को पार्टी का कोषाध्यक्ष बताया गया है।
पदयात्रा की रूपरेखा तैयार करने वाली पहली टीम का हिस्सा रहे जन सुराज पार्टी के एक ‘साथी’ के अनुसार, यह रणनीति इस तथ्य के इर्द-गिर्द रची गई थी कि बिहार में लगभग 38,800 राजस्व गाँव हैं, लेकिन इसके 9.2 करोड़ ग्रामीण निवासियों का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ़ 15,000 से 20,000 गाँवों में रहता है जिनकी आबादी 1,000 से ज़्यादा है।
प्रशांत के करीबी कहते हैं,
” इस यात्रा की प्लानिंग घनी आबादी वाले गाँवों को शामिल करते हुए किया गया था ताकि लोगों तक पहुँच और जुड़ाव को अधिकतम किया जा सके। इन घनी आबादी वाले गाँवों की पहचान हो जाने के बाद, अनुसूचित जातियों, अत्यंत पिछड़े वर्गों (ईबीसी) और गैर-यादव अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) की घनी आबादी वाले गाँवों पर ध्यान केंद्रित करने की रणनीति बनाई गई थी। किशोर के आगमन से काफी पहले ही प्रत्येक गाँव के लिए 10 से 20 लोगों की एक फील्ड टीम तैनात कर दी गई थी। इन टीमों ने स्थानीय राजनीतिक रूप से प्रासंगिक व्यक्तियों और पंचायत स्तर पर अति-स्थानीय मुद्दों पर विस्तृत आँकड़े एकत्र किए। चुने गए मार्ग पर, सभाओं या जनसभाओं के लिए प्रतिदिन तीन-पाँच प्रमुख पड़ावों की पहचान की गई, जहाँ किशोर स्थानीय मुद्दों पर तीखे और आंकड़ों से भरपूर भाषण देते थे।”
इन सभाओं को टीम द्वारा ‘स्वागत बिंदु’ कहे जाने वाले स्थानों के साथ जोड़ा गया था, जहाँ स्थानीय नेताओं, खासकर उन नेताओं को, जो पहले पंचायत चुनाव हार चुके थे, लेकिन प्रभाव बनाए रखा था, अपने मतदाता आधार को किशोर से मिलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।
इन नेताओं को पहले से ही फील्ड टीम द्वारा चिन्हित और संलग्न किया गया था, जिसका लक्ष्य भीड़ और भावी पार्टी कार्यकर्ताओं, दोनों को जन सुराज अभियान से जोड़ना था। इन जनसभाओं की एक प्रमुख विशेषता ‘जन घोषणापत्र’ का विमोचन था, जो अति-स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित एक पंचायत-विशिष्ट दस्तावेज़ था।
यह नीचे से ऊपर की ओर घोषणापत्र मॉडल यात्रा की पहचान बन गया। साथ ही, टीम ने युवाओं को जोड़ने और एक दीर्घकालिक समर्थन आधार बनाने के लिए, प्रत्येक गाँव में खेल और इनडोर खेल किटों से सुसज्जित 10 युवा क्लब स्थापित करने का एक अनूठा लक्ष्य रखा।
समितियाँ भी बनाई गईं, जिनमें पंचायत स्तर पर 101 सदस्य, ब्लॉक स्तर पर 251 और ज़िला स्तर पर 501 सदस्य शामिल थे, ताकि ज़मीनी स्तर पर जुड़ाव को औपचारिक रूप दिया जा सके। प्रत्येक दिन, शाम को एक भव्य सभा आयोजित की जाती थी। रात्रि सभाओं में भीड़ को आकर्षित करने के लिए भोजन और अच्छी तरह से रोशनी वाले बड़े पंडाल लगाए जाते थे।
विचार सरल था – यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक कार्यक्रम में अधिकतम दृश्यता, भागीदारी और सूचना का प्रसार हो। एक मज़बूत डिजिटल-मीडिया रणनीति के माध्यम से ज़मीनी स्तर पर प्रचार-प्रसार को और बढ़ाया गया, जिससे जन सुराज का संदेश पदयात्रा की भौतिक पहुँच से कहीं आगे तक पहुँच सका।
वरिष्ठ पत्रकार और आउटलुक पत्रिका में काम कर चुके कुमार पंकज कहते हैं,
”देखिए बिहार का विधानसभा चुनाव इस बार बड़ा रोचक होगा। प्रशांत किशोर के आने से सारी पार्टियों के समीकरण बिगडेंगे लेकिन नुकसान ज्यादा किसका होगा यह देखना है। पीके की टीम बड़े ही रणनीतिक तरीके से अपने चुनावी अभियान को आगे बढ़ा रही है। यह सही है कि बिहार में ज्यादातर सीटों हार जीत का अंतर 5 हजार मतों के आसपास ही होता है और इतने वोट भी पीके के उम्मीदवारों को मिले तो नतीजें चौकाने वालें आ सकते हैं।”