प्रशांत किशोर
Prashant Kishor: बिहार की राजनीति दशकों तक दो ध्रुवों में बंटी रही है. एक तरफ नीतीश कुमार और बीजेपी का एनडीए गठबंधन, तो दूसरी ओर लालू-तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला महागठबंधन. गठबंधनों के बनने-बिगड़ने के इस खेल में मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग उपेक्षित भी महसूस करता रहा है.
इसी राजनीतिक ठहराव के बीच, चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) ने ‘किंगमेकर’ की अपनी भूमिका को छोड़कर सीधे चुनाव मैदान में ताल ठोंकने का फैसला किया. उनका ‘जन सुराज’ अभियान बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय लिखने की कोशिश कर रहा है. पीके के ‘जन सुराज’ का लक्ष्य 30 साल से स्थापित सत्ता के समीकरणों को चुनौती देना है.
प्रशांत किशोर को समझने से पहले उनका ट्रैक रिकॉर्ड जानना होगा. 2014 में नरेंद्र मोदी का चुनाव अभियान चलाकर बीजेपी को केंद्र में पूर्ण बहुमत दिलाना उनकी बड़ी सफलता थी. इसके ठीक बाद, 2015 में उन्होंने बिहार में नीतीश कुमार के गठबंधन को एक मुश्किल लड़ाई में जीत दिलाई. उनकी सफलता का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में एमके स्टालिन और आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की ऐतिहासिक जीत में भी पीके का भी योगदान था. इन जीतों ने उन्हें एक ऐसे रणनीतिकार के रूप में स्थापित किया, जो चुनावी जीत का अचूक फॉर्मूला जानता है.
राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा आम है कि एक सलाहकार की भूमिका से निकलकर सीधे राजनीति में आने की उनकी इच्छा तब सामने आई, जब उन्होंने जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद संभाला. हालांकि, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) जैसे मुद्दों पर नीतीश कुमार से उनके मतभेद इतने बढ़े कि उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया. यहीं से प्रशांत किशोर के सीधे राजनीतिक मैदान में उतरने की नींव पड़ी.
प्रशांत किशोर का ‘जन सुराज’ अभियान सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि 3500 किलोमीटर से अधिक की एक महा-पदयात्रा थी. इस यात्रा में वे महीनों से गांवों में रहे, सीधे लोगों से मिले. यह केवल जनसंपर्क नहीं, बल्कि बिहार की नब्ज को समझने और एक नया संगठन खड़ा करने की कवायद थी. अपनी यात्रा के दौरान प्रशांत किशोर बड़े सुनियोजित तरीके से नीतीश समेत तेजस्वी यादव पर प्रहार करते थे. वे अक्सर उन मुद्दों को उठाते जिनसे जनता का सीधे सरोकार है. प्रशांत किशोर अपने भाषणों में कहते हैं, “30 साल के लालू-नीतीश के राज ने बिहार को देश का सबसे गरीब राज्य बना दिया है, और अब अपने बच्चों के भविष्य के लिए वोट देने का वक्त है.”
पीके ने केवल हवा-हवाई आरोप नहीं लगाए, बल्कि सबूतों के साथ बड़े नेताओं को घेरा है. उन्होंने उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को 1995 के तारापुर नरसंहार से जोड़ा और अदालती दस्तावेजों के आधार पर उन पर उम्र में हेरफेर का आरोप लगाया. इसी तरह, उन्होंने ताकतवर कैबिनेट मंत्री अशोक चौधरी पर सरकारी ठेकों में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए उनकी बेनामी संपत्ति का खुलासा करने की धमकी दी.
जब विरोधियों ने उनके अभियान की फंडिंग पर सवाल उठाए, तो पीके ने अपनी कमाई और चंदे का पूरा हिसाब सार्वजनिक कर दिया. उन्होंने बताया कि पिछले तीन सालों में उन्होंने कंसल्टेंसी से 241 करोड़ रुपये कमाए, टैक्स चुकाया और ‘जन सुराज’ को 98.5 करोड़ रुपये का दान दिया. इससे साफ है कि पीके पहले से ही पूरा होमवर्क करके रखते हैं.
पीके की राह में सबसे बड़ी बाधा बिहार की जाति आधारित राजनीति है. यहां दशकों से राजद का ‘एम-वाई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण और एनडीए का सवर्ण-अति पिछड़ा-महादलित गठबंधन चुनावी नतीजों को तय करता आया है. ऐसे में पीके को किसका वोट मिलेगा और उन्हें कितनी सफलता मिलेगी, इसके लिए हमें 14 नवंबर तक का इंतजार करना होगा।
इंडियन पालिटक्स डेस्क।