विद्या शंकर राय
बिहार विधानसभा चुनाव में मोकामा विधानसभा क्षेत्र इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। वजह हैं बाहुबली अनंत कुमार सिंह। पिछले 50 साल से इस सीट पर भूमिहार प्रत्याशी ही चुनाव जीतते आ रहे हैं। चाहे उनका दल कोई भी हो। इस क्षेत्र में यादव, धानुक, कोइरी, कुर्मी जाति भी अच्छी तादाद में हैं। लालू यादव के विरोध के बाद भी अनंत सिंह चुनाव जीतते रहे हैं। अभी तक अनंत सिंह पर यादवों का विरोध कोई असर नहीं डाल सका है।
2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और लालू यादव एक हो गए थे। इस चुनाव में अनंत सिंह निर्दलीय खड़ा थे। लालू-नीतीश ने अपने गठबंधन से यहां भूमिहार नेता नीरज कुमार को मैदान में उतारा था। महागठबंधन ये सोच रहा था कि यादव (लालू यादव), कुर्मी (नीतीश कुमार) और भूमिहार (नीरज कुमार) की त्रवेणी में अनंत सिंह तिनके की तरह बह जाएंगे। लेकिन, सारे अनुमान धरे के धरे रह गए। अनंत सिंह लालू-नीतीश के संयुक्त विरोध के बाद भी करीब 18 हजार वोटों से जीत गए। वो भी बिना एक दिन प्रचार किए।
2015 का चुनाव अनंत सिंह की सियासी ताकत का असल सबूत है। इस चुनाव में भाजपा और लोजपा का गठबंधन भी था। लोजपा ने इस सीट पर सूरजभान सिंह के भाई कन्हैया सिंह को मैदान में उतारा था। कन्हैया सिंह को भूमिहार वोट, लोजपा के पासवान वोट और भाजपा के आधार वोट मिलने की आशा थी। लेकिन उनकी भी आशा पूरी नहीं हुई। कन्हैया सिंह को केवल 15 हजार 472 वोट ही मिले। यानी मोकामा में भाजपा और लोजपा भी कोई फैक्टर नहीं हैं।
अनंत सिंह की चुनावी जीत बिहार की राजनीति के लिए एक आश्चर्यजनक घटना है। राजनीति पंडित भी इसका सटीक विश्लेषण नहीं कर सकते। आज के दौर में क्या यादव, कुर्मी, पासवान जैसी मजबूत जातियों के विरोध को झेल कर कोई चुनाव जीत सकता है? लेकिन अनंत सिंह पर ये सवाल लागू नहीं होता। वे जीत जाते हैं।
अनंत सिंह के सामने भाजपा का सवर्ण और वैश्य कार्ड भी फेल हो जाता है। कोई ऐसा व्यक्ति जो बिहार की प्रचलित जातीय समीकरण और विचारवाद से परे हो, बेअसर हो, उसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर पॉलिटिशियन ही माना जाएगा। लेकिन ऐसी असाधारण क्षमता रखने के बावजूद अनंत सिंह केवल अपनी छवि के कारण से मार खा जाते हैं। उन पर लदे आपराधिक मुकदमे उनकी राह में रोड़ा हैं। इन विवादों के कारण वे सम्मानित और विशिष्ट नेता के श्रेणी में नहीं आ पाते।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)