आज सावन का आखिरी सोमवार है. सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की भक्ति, जलाभिषेक और साधना के लिए विशेष फलदायी माना जाता है. मान्यता है कि इस पावन मास में महादेव अपने भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं. महाभारत काल से ही सावन और शिव पूजा का गहरा नाता रहा है. दरअसल, अज्ञातवास और वनवास के कठिन समय में पांडवों ने भी भगवान शिव की शरण ली थी और युद्ध में विजय व धर्म की स्थापना के लिए सावन में जगह-जगह शिवलिंग की स्थापना कर कठिन तपस्या की थी.
आज देश भर में स्थित पांडवों से जुड़े प्राचीन शिव मंदिर श्रद्धालुओं के लिए अटूट श्रद्धा के केंद्र हैं, जहां सावन के महीने में भक्त महादेव का जलाभिषेक करने दूर-दूर से पहुंचते हैं. आइए जानते हैं पांडवों द्वारा स्थापित और पूजे गए ऐसे ही प्रमुख शिव धामों के बारे में.
लोधेश्वर महादेव मंदिर, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में स्थित लोधेश्वर महादेव मंदिर को पांडवों से जुड़ा प्राचीन शिव मंदिर माना जाता है. मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान यहां भगवान शिव की आराधना की थी. कहा जाता है कि उन्होंने युद्ध में विजय और अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने की कामना से यहां तपस्या और अनुष्ठान किए थे. मंदिर के गर्भगृह में प्राचीन शिवलिंग विराजमान है. यहां माता पार्वती से जुड़ी प्राचीन प्रतिमाओं के होने की भी मान्यता है. स्थानीय परंपरा के अनुसार, वेदव्यास मुनि के कहने पर पांडवों ने यहां रुद्र महायज्ञ किया था.
घाघरा नदी के तट के पास स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. मंदिर परिसर में ‘पांडव कूप’ नाम का एक प्राचीन कुआं भी बताया जाता है. मान्यता है कि इसके पानी में औषधीय गुण हैं और इसे पीने से कई बीमारियां दूर हो जाती हैं. हालांकि इन दावों का वैज्ञानिक प्रमाण अलग विषय है. सावन के महीने में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं. महाशिवरात्रि के अवसर पर भी मंदिर में दूर-दूर से भक्त दर्शन के लिए आते हैं. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना पूरी होती है. मंदिर का वर्तमान स्वरूप समय के साथ हुए निर्माण और जीर्णोद्धार का परिणाम है. हालांकि आसपास खुदाई के दौरान प्राचीन लाल ईंटें मिलने की बात भी कही जाती है.
पांडेश्वरनाथ धाम, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
प्रयागराज में स्थित पांडेश्वरनाथ धाम को भी पांडवों से जुड़ा प्राचीन शिव मंदिर माना जाता है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, अज्ञातवास के दौरान जब पांडव इस क्षेत्र में पहुंचे, तब उन्होंने यहां शिवलिंग की स्थापना की और भगवान शिव की पूजा की. कहा जाता है कि अंगदेश और मगध की यात्रा के दौरान पांडवों ने ऋषि भारद्वाज की सलाह पर यहां शिवलिंग की स्थापना की थी. इसी वजह से इस स्थान का संबंध पांडवों से जोड़ा जाता है.
यह मंदिर पत्थरों से निर्मित प्राचीन संरचना के लिए भी जाना जाता है. इसे प्रयागराज की पंचकोसी परिक्रमा से जुड़े प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है. स्थानीय मान्यता में इसे सिद्धपीठ भी कहा जाता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां भगवान शिव के दर्शन और पूजा करने से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं.
ममलेश्वर महादेव मंदिर, हिमाचल प्रदेश
हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत वादियों में स्थित ममलेश्वर महादेव मंदिर का संबंध भी महाभारत काल और पांडवों से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव कुछ समय के लिए इस क्षेत्र में रुके थे और इसी दौरान उन्होंने यहां भगवान शिव की स्थापना की थी. मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं मौजूद हैं. यहां एक प्राचीन शिवलिंग भी स्थापित है.
स्थानीय मान्यता के अनुसार, इसी क्षेत्र में भीम की मुलाकात हिडिंबा से हुई थी, जो बाद में उनकी पत्नी बनीं. मंदिर में भीम से जुड़ा एक विशाल ढोल भी रखा हुआ है. इसे स्थानीय लोग भीम का ढोल मानते हैं. मंदिर में लगभग 200 ग्राम वजन का एक प्राचीन गेहूं का दाना भी रखा होने की बात कही जाती है. मान्यता है कि यह दाना पांडवों के समय का है और उन्होंने इसे यहां उगाया था.
मंदिर परिसर में एक अखंड अग्नि या धूनी से जुड़ी मान्यता भी प्रचलित है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह अग्नि महाभारत काल से लगातार जल रही है. हालांकि इतने लंबे समय तक इसके लगातार जलते रहने के दावे की ऐतिहासिक पुष्टि अलग विषय है.
श्री कालीनाथ महाकालेश्वर महादेव मंदिर, हिमाचल प्रदेश
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के देहरा क्षेत्र के परागपुर गांव में स्थित श्री कालीनाथ महाकालेश्वर महादेव मंदिर ब्यास नदी के तट पर स्थित है. इस मंदिर का संबंध भी पांडवों से जुड़ी लोकमान्यताओं से बताया जाता है.
मान्यता है कि लाक्षागृह की घटना से सुरक्षित बचने के बाद पांडवों ने यहां भगवान शिव की आराधना की थी. मंदिर में स्थापित शिवलिंग को विशेष माना जाता है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, इसमें भगवान शिव और माता महाकाली दोनों की शक्तियों का वास है. कहा जाता है कि यहां स्थापित शिवलिंग धीरे-धीरे जमीन के अंदर धंसता जा रहा है. इसे लेकर भी कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं.
एक अन्य कथा के अनुसार, वनवास के दौरान पांडव अपने साथ प्रयाग, उज्जैन, नासिक, हरिद्वार और रामेश्वरम जैसे प्रमुख तीर्थों का जल लेकर आए थे. उन्होंने इन पांच तीर्थों के जल को यहां एक तालाब में मिलाया था. इसी वजह से इस स्थान को पंचतीर्थी कहा जाने लगा. मान्यता है कि पंचतीर्थी में स्नान करना पुण्यदायी होता है और बैसाखी के दिन यहां स्नान करने का विशेष धार्मिक महत्व है.
लाखामंडल महादेव मंदिर, उत्तराखंड
उत्तराखंड में यमुना नदी के तट पर स्थित लाखामंडल महादेव मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है. इसका संबंध भी महाभारत काल और पांडवों की कथा से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए लाक्षागृह का निर्माण करवाया था. पांडव इस षड्यंत्र से बचकर एक गुफा के रास्ते बाहर निकल गए थे. जिस स्थान से पांडवों के बाहर निकलने की कथा कही जाती है, वहां चित्रेश्वर महादेव से जुड़ी गुफा भी बताई जाती है, जो लाखामंडल गांव के पास स्थित है. कहा जाता है कि इस घटना के बाद युधिष्ठिर ने भगवान शिव और माता पार्वती के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए यहां मंदिर का निर्माण करवाया और शिवलिंग की स्थापना की.
मंदिर परिसर में अलग-अलग रंग और आकार के दो शिवलिंग मौजूद हैं. यहां एक चट्टान पर माता पार्वती के पैरों के निशान होने की मान्यता भी है. आज लाखामंडल महादेव मंदिर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. हालांकि मंदिर और पांडवों के संबंध से जुड़ी कई बातें स्थानीय मान्यताओं और लोककथाओं पर आधारित हैं.