वृंदावन
वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मंदिर में दान किया गया एक-एक पैसा दान पात्र यानी गुल्लक (Donation Boxes) में जमा चढ़ावा या ऑनलाइन माध्यम से भेजी गई रकम सीधे मंदिर के आधिकारिक खजाने और खाते में ही जानी चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि सेवायत या कोई अन्य व्यक्ति इस प्रक्रिया में कोई बाधा खड़ी करता है तो इस कृत्य को बहुत गंभीरता से लिया जाएगा. इसके साथ ही मंदिर की प्रबंध समिति को किसी भी तरह की गड़बड़ी रोकने के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था लागू करने का आदेश कोर्ट ने दिया है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मंदिर के धन का उपयोग करके कोई भी संपत्ति या जमीन खरीदने के किसी भी प्रस्ताव पर अमल करने से पहले उसे अदालत के समक्ष लाना अनिवार्य होगा. याचिकाकर्ता की वकील तन्वी दुबे ने कहा कि हाई पावर कमेटी ने साल भर में 40 करोड़ रुपये खर्च कर दिए, लेकिन हालात जस के तस हैं. उल्टे श्रद्धालुओं की दिक्कत और बढ़ गई है. मंदिर के धन का उपयोग करके जमीन खरीदी गई है।
अधिकारियों की मनमानी पर रोक लगाई थी
वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन और परंपराओं को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाई पावर कमेटी में प्रतिनिधियों के चयन को लेकर अधिकारियों की मनमानी पर रोक लगाई थी. कोर्ट ने कहा था कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गए प्रतिनिधि ही समिति में गोस्वामी समाज का प्रतिनिधित्व करेंगे।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने अपने आदेश में कहा था कि हाई पावर कमेटी में बांके बिहारी के राजभोग और शयन भोग सेवाधिकारियों में से दो-दो चुने हुए प्रतिनिधि शामिल किए जाएंगे. शयन भोग से गोपेश और हिमांशु गोस्वामी, जबकि राजभोग सेवाधिकारी के रूप में रजत और शैलेंद्र गोस्वामी को समिति में शामिल किया जाना था।
दरअसल, पिछले साल अगस्त में इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर जज जस्टिस अशोक कुमार की अगुआई में एक हाई पावर कमेटी बनाई गई थी. इस समिति में मथुरा के डीएम समेत अन्य अधिकारी और गोस्वामी समाज के चार प्रतिनिधियों को शामिल किया गया था. समिति का मकसद मंदिर में दर्शन व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन को बेहतर बनाना था।