जयंत चौधरी
उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियों और रणनीति को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। सूत्रों की मानें तो राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के राष्ट्रीय अध्यक्ष
जयंत चौधरी को आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपनी सीटों में बड़ी कटौती का सामना करना पड़ सकता है जिसको लेकर पार्टी के भीतर अभी से मंथन शुरू हो गया है।
दरअसल 2022 में समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठबंधन में पश्चिमी यूपी में 33 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली रालोद इस बार शायद आधी से भी कम सीटों पर संतोष करे। भाजपा के सूत्रों की मानें तो एनडीए के भीतर चल रही सीट-शेयरिंग की बातचीत में यह मुद्दा अब चर्चा का केंद्र बन गया है।
2022 के विधानसभा चुनाव में रालोद ने 33 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 8 सीटें जीती थीं। जिन सीटों पर जीत मिली थी उनमें छपरौली, थाना भवन, बुढ़ाना, सिवालखास, मीरापुर, पुरकाजी (एससी), शामली और सदाबाद शामिल हैं।
इस चुनाव में 19 सीटों पर पार्टी दूसरे नंबर पर रही, 5 पर तीसरे और खेरागढ़ में चौथे स्थान पर। लेकिन इन 33 में से 25 सीटों पर अब भाजपा के विधायक हैं, इसलिए रालोद अब उन सीटों पर दावा नहीं कर सकती।
रालोद के एक वरिष्ठ राष्ट्रीय पदाधिकारी ने UNI को बताया, “पार्टी ने भाजपा से बैक-चैनल बातचीत शुरू कर दी है ताकि उसे पश्चिमी यूपी और रोहिलखंड में उन सीटों पर मौका मिले जहां भाजपा को सपा से हार मिली थी। इनमें सरधना, किठौर, बेहट, मुरादाबाद ग्रामीण, छर्रा, बहेड़ी और भोजीपुरा शामिल हैं। साथ ही मध्य और पूर्वी यूपी की कुछ सीटों पर भी आरएलडी बात कर रही है।”
पार्टी सूत्रों का कहना है कि रालोद सिर्फ अपने पारंपरिक जाट-गुर्जर वोट बैंक तक सीमित नहीं रहना चाहती। वह मुस्लिम मतदाताओं तक भी पहुंच बनाने की कोशिश में है, जो ऐतिहासिक रूप से सपा या कांग्रेस को वोट देते रहे हैं। इससे भाजपा अपने सामाजिक गठबंधन को और चौड़ा कर सकेगी, बिना अपने मौजूदा विधायकों की सीटें छोड़े।
रालोद के पदाधिकारी ने बताया कि पार्टी के लिए असली परीक्षा सीटों की संख्या नहीं, जीत का अनुपात होगी। अगर पार्टी 15 सीटों पर लड़े और 8-10 जीते, तो वह एनडीए में अपनी साख मजबूत कर सकेगी। लेकिन अगर ज्यादा सीटों पर लड़े और गिनती की सीटें ही जीते, तो भविष्य में उसकी सौदेबाजी कमजोर पड़ सकती है।
सूत्रों का कहना है कि रालोद से गठबंधन सीटों के गणित से ज्यादा सामाजिक समीकरण के लिए है। पश्चिमी यूपी में जाट बाहुल्य संगठन को एनडीए के साथ रखने से गैर-यादव ओबीसी और किसान वोटों को साधने में मदद मिलती है।
हालाकि रालोद के सूत्रों की मानें तो अगर आरएलडी की सीटें बहुत कम हुईं तो जिला स्तर के प्रभावशाली नेताओं में नाराजगी बढ़ सकती है। टिकट न मिलने पर कुछ नेता विपक्ष की ओर रुख कर सकते हैं। इससे पार्टी का स्वतंत्र संगठनात्मक विस्तार सीमित होगा और वह राजनीतिक प्रासंगिकता के लिए भाजपा पर और निर्भर हो जाएगी।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अब देखना यह है कि एनडीए की सीट-शेयरिंग की अंतिम रूपरेखा में आरएलडी कितना समायोजन करती है और गठबंधन धर्म निभाते हुए अपनी जमीनी ताकत को बरकरार रख पाती है या नहीं।
रालोद के प्रदेश अध्यक्ष रामाशीष राय ने कहा, “हम अपने मजबूत इलाकों में अच्छी स्थिति में हैं। लेकिन एनडीए की जीत सुनिश्चित करने के लिए हम भाजपा के साथ गठबंधन धर्म निभाएंगे।”
इंडियन पालिटिक्स न्यूज डेस्क।