भाजपा उत्तर प्रदेश
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दल पूरी ताकत के साथ तैयारियों में जुटे हैं। इसी बीच सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर उभरते विरोधी सुरों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। जनप्रतिनिधियों बनाम अधिकारियों और सरकार बनाम संगठन के बीच खिंचती रेखा अब सार्वजनिक बहस का विषय बनती जा रही है।
30 जनवरी को महोबा में जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और स्थानीय भाजपा विधायक बृजभूषण राजपूत के बीच सड़क पर हुआ तीखा विवाद इसी अंतर्विरोध का ताजा उदाहरण माना जा रहा है। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने इसे मामूली घटना बताया, लेकिन सियासी गलियारों में इसे सत्ता और संगठन के बीच असंतुलन की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
महोबा में जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और भाजपा विधायक बृजभूषण राजपूत के बीच हुई तीखी नोकझोंक को लेकर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने संक्षिप्त प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पूरा मामला पार्टी के संज्ञान में है। इस मामले में दोनों नेताओं से बात कर ली गई है।
हालाकि यह पहला मौका नहीं है जब भाजपा के भीतर अनुशासन की दीवार में दरार दिखाई दी हो। बीते कुछ वर्षों में ऐसे कई प्रसंग सामने आए हैं, जब जनप्रतिनिधियों की महत्वाकांक्षा और प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर असंतोष खुलकर सामने आया।
इससे पहले जुलाई 2022 में जलशक्ति राज्यमंत्री दिनेश खटीक द्वारा अधिकारियों पर उपेक्षा और भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए सार्वजनिक रूप से इस्तीफा देना, इसी बेचैनी का बड़ा संकेत था। हालांकि बाद में मामला संभाल लिया गया, लेकिन तब यह संदेश साफ चला गया कि अंदरखाने सब कुछ ठीक नहीं है।
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी पार्टी के भीतर कलह खुलकर सामने आई थी। मुजफ्फरनगर सीट से चुनाव लड़ रहे केंद्रीय मंत्री डॉ. संजीव बालियान और भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम के बीच चली तीखी जुबानी जंग का असर कई सीटों पर पड़ा। चुनाव परिणाम आने के बाद सहारनपुर से भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल शर्मा ने खुले तौर पर अपनी हार के लिए पार्टी के ही मंत्री और विधायक पर आरोप लगाकर सियासी तापमान और बढ़ा दिया।
उत्तर प्रदेश की सियासत में सत्ताधारी भाजपा के भीतर ही नहीं, बल्कि भाजपा और उसके सहयोगी दलों के मंत्रियों के बीच भी खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। ताजा मामला कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर और अनिल राजभर के बीच बढ़ते टकराव का है, जो अब सार्वजनिक मंचों तक पहुंच गया है।
दोनों नेता न सिर्फ एक ही जाति से आते हैं, बल्कि एक ही इलाके के निवासी हैं और योगी सरकार में कैबिनेट स्तर के मंत्री भी हैं। लंबे समय से चली आ रही आपसी अदावत अब तीखी बयानबाजी में बदलती दिख रही है।
कुछ दिन पहले अनिल राजभर एक कार्यक्रम में भाषण दे रहे थे, तभी पीला गमछा पहने कुछ लोगों ने नारेबाजी शुरू कर दी। इससे नाराज मंत्री अनिल राजभर ने नारेबाजी कर रहे लोगों को ओम प्रकाश राजभर का समर्थक बताते हुए कहा, “जैसा इनका नेता चोर है, वैसे ये भी चोर हैं।” इसके बाद उन्होंने अपने समर्थकों से नारेबाजी कर रहे लोगों को बाहर निकालने को कहा, जिसके बाद उन्हें धक्का देकर कार्यक्रम स्थल से बाहर कर दिया गया।
इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए ओम प्रकाश राजभर ने अनिल राजभर पर पलटवार करते हुए कहा कि “उंगली उठाने वाले 23 साल पहले लोहे की दुकान चलाते थे और चोरी करते थे।” उन्होंने चुनौती देते हुए कहा, “अगर मर्द हैं और मां का दूध पिया है तो बताएं कि वोट बेचने की दुकान कहां है।”
ओम प्रकाश राजभर के बयान पर जवाब देते हुए कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने कहा कि “वह मां को बीच में क्यों ला रहे हैं? मां तो मां होती है, चाहे किसी की भी हो।”
चुनाव की दहलीज पर खड़ी भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता का भरोसा बनाए रखने की है। जमीनी हकीकत यह है कि कई क्षेत्रों में जनप्रतिनिधि खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं, वहीं अधिकारी वर्ग पर अत्यधिक प्रभाव के आरोप लगते रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में मंत्रिमंडल विस्तार, पंचायत चुनाव, प्रदेश संगठन का पुनर्गठन और 2027 विधानसभा चुनाव से पहले असंतोष को नियंत्रित करने के लिए भाजपा और संघ के बीच समन्वय बैठकों का नया एजेंडा तैयार किया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार और संगठन के बीच तालमेल को समय रहते मजबूत नहीं किया गया, तो यह अंतर्विरोध विपक्ष के लिए बड़ा हथियार बन सकता है। आने वाले महीनों में भाजपा नेतृत्व इन विरोधी सुरों को कितनी सफलतापूर्वक साध पाता है, यही आगामी चुनावी तस्वीर तय करेगा।
इंडियन-पालिटिक्स न्यूज