अमेरिका
अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर अपने हमले तेज कर दिए हैं. राजधानी तेहरान में एक सौ साल पुराने मेडिकल रिसर्च सेंटर, राजधानी के पास एक पुल और स्टील प्लांट्स को निशाना बनाया गया. यह कार्रवाई उस समय हुई जब डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को स्टोन एज में पहुंचाने की धमकी दी थी.
वहीं ईरान की सेना ने चेतावनी दी है कि यह युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक उसके दुश्मनों की बेइज्जती और समर्पण नहीं हो जाता. साथ ही, ईरान ने अमेरिका की संभावित जमीनी कार्रवाई को लेकर भी गंभीर चेतावनी जारी की है.
इस बीच कई शुरुआती मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ ईरान के ऊपर मार गिराए गए अमेरिकी एफ़-15 लड़ाकू विमान के पायलट को बचा लिया गया है। अगर इसकी पुष्टि होती है, तो यह दशकों से चल रही अमेरिकी कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू मिशनों की लंबी परंपरा की एक और कड़ी होगी.
बीबीसी के अमेरिकी साझेदार सीबीएस के मुताबिक़, दूसरे क्रू मेंबर की तलाश के लिए ईरान के अंदर गहराई से खोज अभियान अभी भी जारी है।
कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू (सीएसएआर) मिशन को सबसे जटिल और समय के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील सैन्य अभियानों में माना जाता है, जिनकी तैयारी अमेरिका और उसके सहयोगी देश करते हैं।
अमेरिका में वायुसेना की विशेष यूनिट्स को सीएसएआर मिशनों के लिए ख़ासतौर पर प्रशिक्षित किया जाता है और उन्हें अक्सर पहले से ही उन इलाक़ों के पास तैनात कर दिया जाता है जहां संघर्ष के दौरान विमान गिरने की आशंका होती है।
सीधे शब्दों में कहें तो सीएसएआर मिशन ऐसे सैन्य ऑपरेशन होते हैं जिनका मक़सद ज़रूरत में फंसे सैनिकों को ढूंढना, उनकी मदद करना और उन्हें सुरक्षित निकालना होता है, जैसे कि गिराए गए पायलट या अलग-थलग पड़े सैनिक।
प्राकृतिक आपदा या मानवीय राहत के दौरान होने वाले सामान्य सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन से अलग सीएसएआर मिशन दुश्मन या संघर्ष वाले इलाकों में किए जाते हैं।
कुछ मामलों में ये मिशन दुश्मन के इलाके के काफ़ी अंदर तक जाकर किए जाते हैं. जैसा कि शुक्रवार को ईरान को लेकर बताया गया ऑपरेशन है।
हालांकि अमेरिकी सेना की हर शाखा के पास सीमित सीएसएआर क्षमता होती है, लेकिन सैनिकों को ढूंढने और बचाने की मुख्य ज़िम्मेदारी अमेरिकी वायुसेना की होती है।
यह काम मुख्य रूप से पैरा-रेस्क्यूमैन करते हैं, जो सेना की स्पेशल ऑपरेशन यूनिट्स का हिस्सा होते हैं।
पैरा-रेस्क्यू का आधिकारिक नारा है: “हम ये सब करते हैं ताकि दूसरे जीवित रह सकें”। इनके काम को इस वादे का हिस्सा माना जाता है कि किसी भी अमेरिकी सैनिक को पीछे नहीं छोड़ा जाएगा.
ये जवान लड़ाई और मेडिकल दोनों कामों में माहिर होते हैं. इनके अमेरिकी सेना के सबसे कठिन ट्रेनिंग सिस्टम में से एक से गुज़रना पड़ता है।
चयन और ट्रेनिंग की पूरी प्रक्रिया लगभग दो साल चलती है. इसमें पैराशूट ट्रेनिंग, डाइविंग, पानी के अंदर काम करने की ट्रेनिंग, सर्वाइवल ट्रेनिंग, दुश्मन से बचाव और निकलने की ट्रेनिंग, और सिविलियन पैरामेडिक कोर्स शामिल होता है।
इसके अलावा इन्हें युद्ध के मैदान में मेडिकल मदद, जटिल बचाव ऑपरेशन और हथियारों की भी ख़ास ट्रेनिंग दी जाती है।
मिलिट्री न्यूज़ वेबसाइट सोफ़रेब के मुताबिक़, आमतौर पर क़रीब 80 फ़ीसदी उम्मीदवार इस ट्रेनिंग को पूरा नहीं कर पाते, और कई बार यह संख्या इससे भी ज़्यादा होती है।
ज़मीन पर इन टीमों का नेतृत्व कॉम्बैट रेस्क्यू ऑफ़िसर्स करते हैं, जो पूरी तरह प्रशिक्षित होते हैं और बचाव मिशनों की योजना बनाने, तालमेल बैठाने और उन्हें अंजाम देने की ज़िम्मेदारी संभालते हैं।
इंडियन पालिटिक्स न्यूज डेस्क।